दीदी - भाग १

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दीदी - भाग १

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उस ऐतिहासिक हवेली के विशाल शयनकक्ष में संध्या के ढलते ही एक अनूठा, सघन और मादक सन्नाटा पसर गया था। बाहर अवध की पुरानी गलियों में इक्के-दुक्के गुजरते कदमों की आहटें और दूर किसी मक़बरे की मीनार से आती अज़ान की गूँज हवा में तैर रही थी, किंतु भीतर का संसार इन सभी बाहरी कोलाहलों और समय की गतियों से कोसों दूर, किसी अन्य लोक का निर्माण कर रहा था।

कमरे के बीचों-बीच रखे भारी आबनूस के उस प्राचीन पलंग पर गहरे लाल रंग की मखमली चादरें तान कर बिछी थीं, और पीतल के झड़बेरदानों तथा तिपाइयों पर रखे मोमबत्तीनुमा दीपों से निकलती पीली, थिरकती हुई लौ दीवारों पर लंबी और कामुक परछाइयाँ बुन रही थीं। कमरे की हवा में चमेली के फूलों, ताजे मोगरे के गजरे और सुलगते हुए लोबान की सोंधी, भारी सुगंध आपस में मिलकर एक ऐसी मादकता पैदा कर रही थी जो मन और मस्तिष्क दोनों को सुप्त अवस्था में ले जाने के लिए पर्याप्त थी।

इस प्राचीन, भव्य और इतिहास-सिक्त परिवेश के केंद्र में बैठी थीं **नीलम**--जो अपनी उम्र के उस पूर्ण ठहराव और प्रगल्भ परिपक्वता पर थीं जहाँ स्त्री का सौंदर्य, उसकी देह का भूगोल और उसकी वाणी दोनों ही किसी गहरी, शांत और अथाह नदी की तरह हो जाते हैं।

उन्हें रति-शास्त्र, कामकला और जीवन के अछूते अनुभवों की सघन समझ प्राप्त थी, और वे आज इस हवेली के एकांत गर्भगृह में अपनी छोटी बहन जैसी स्नेहिल, सुकुमार और भोली **छोटी** को प्रेम का वह पहला और शाश्वत पाठ पढ़ाने बैठी थीं जो सदियों से इस संस्कृति की गुप्त और पावन धरोहर रहा है।

छोटी बहन छोटी--जो कामशास्त्र के नायिका भेद के अनुसार मुग्धा नायिका के सर्वोत्कृष्ट लक्षणों से परिपूर्ण थी--मखमली बिस्तर के कोने पर बैठी अपने रेशमी आंचल के छोर को अपनी कांपती उंगलियों में बार-बार लपेट रही थी।

उसका हृदय एक अज्ञात भय, उत्सुकता और उत्तेजना के बीच तीव्र गति से धड़क रहा था। उसके भीतर उठने वाले वे अनछुए आवेग उसे एक ऐसी देहरी पर खड़ा कर रहे थे जहाँ से आगे केवल समर्पण, रस और प्रकाश का अनंत महासागर था। उसकी मखमली रेशमी साड़ी की सिलवटें उसके लगातार कांपते और ठंडे पड़ते हाथों में और अधिक उलझ गई थीं, मानो वे साड़ी के आंचल को अपनी सुरक्षा का अंतिम कवच मानकर पकड़ रही हों।

नीलम ने बहुत ही सहज, मातृत्व-तुल्य और अगाध स्नेह से आगे बढ़कर अपना गर्म, पुष्ट और भारी हाथ छोटी के ठंडे पड़े और कांपते कंधे पर रखा।

उस हल्के से स्पर्श मात्र से छोटी का पूरा शरीर एक अनजाने, बिजली जैसे सिहरन से झंकार उठा, और उसके रोम-कूप एक पल के लिए खड़े हो गए। नीलम ने अत्यंत मधुर, भारी और आश्वस्त करने वाले स्वर में कहा, "डरो मत, मेरी छोटी। यह कमरा, यह रात और यह एकांत केवल और केवल हमारा है। जो भाव तुम्हारे भीतर इस समय ज्वार और आंधी बनकर उठ रहा है, वह कोई भय या पाप नहीं, बल्कि इस प्रकृति का सबसे सुंदर, सबसे पवित्र संगीत है।"

छोटी ने धीरे से अपनी पलकें उठाईं और नीलम की उन गहरी, प्रज्ञावान आँखों में देखा जिनमें अथाह वात्सल्य और एक शांत आश्वासन का महासागर तैर रहा था। उस पहली नजर के मिलने और एक-दूसरे की आँखों में डूबने के साथ ही छोटी के भीतर का वह कड़ा और कृत्रिम पहरा टूटने लगा जो समाज ने अज्ञान, भय और संकोच के नाम पर खड़ा किया था।

छोटी के दोनों गंडस्थल (गाल) लज्जा और उष्णता से लाल होने लगे, और उसकी छाती का वह उच्चावच भाग तेजी से ऊपर-नीचे होने लगा।

नीलम ने अपनी उंगलियों की पोरों से छोटी के ठंडे कंधों को सहलाते हुए उसके शरीर की उस शुरुआती कठोरता को पिघलाना शुरू कर दिया। उस एकांत शयनकक्ष में अब केवल दोनों की साँसों की वह धीमी लय शेष थी जो धीरे-धीरे एक-दूसरे में घुलने लगी थी।

छोटी ने महसूस किया कि नीलम का यह स्पर्श किसी अधिकार का नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपी हुई उस मुग्धावस्था को एक नई और परिपक्व चेतना में बदलने का पहला पावन अनुष्ठान था।

हवा में तैरती चमेली की महक और दीये की वह मद्धम रोशनी अब उनके प्राणों के मिलन की पहली गवाह बन रही थी, और छोटी का वह संकोच अब पिघलकर नीलम के चरणों में समर्पित होने के लिए पूरी तरह तैयार हो चुका था।

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नीलम की वह मखमली, सधी हुई और आश्वस्त करने वाली उपस्थिति ने धीरे-धीरे छोटी के मन के हर कोने से उस अंधेरे को खींचना और साफ करना शुरू कर दिया जिसे अज्ञान और भय कहा जाता है।

नीलम ने बहुत ही सुकुमारता से अपने हाथ को आगे बढ़ाया और छोटी की ठुड्डी (चिबुक) को अपनी उंगलियों के सहारे धीरे से ऊपर उठाया, जिससे छोटी चाहकर भी नजरें न चुरा सके और उसे अपनी आँखें मिलाकर उस असीम आत्मीयता को सीधे देखने का अवसर मिला।

नीलम की उंगलियाँ जब छोटी के कोमल, दूध जैसे सफेद गालों और कपोलों पर फिरीं, तो उनकी हथेलियों की स्वाभाविक गर्माहट ने छोटी की त्वचा की उस ठंडक और कंपकंपी को पूरी तरह पिघला दिया। छोटी का वह संकोच, जो संध्या के समय उसे एक जड़ पत्थर की मूर्ति बनाए हुए था, अब नीलम के उस निरंतर, अथाह और बहते हुए स्नेह के आगे पानी की तरह बहने लगा था। नीलम ने बहुत ही सधे हुए, धीमे और मखमली स्वरों में कहा, "प्रेम को पूरी तरह पाने और महसूस करने से पहले अपनी इस सुकुमार देह से डरना और नफरत करना छोड़ना पड़ता है, छोटी। यह शरीर कोई ऐसा कारागार या पाप की खान नहीं है जिसमें तुम्हारी आत्मा को कोई सजा दी गई हो, बल्कि यह तो वह सबसे पवित्र पात्रा है जिसमें इस ब्रह्मांड का सारा आनंद, सारा सौंदर्य और सारा रस भरा हुआ है।"

छोटी ने अपनी आँखें धीरे से मूँद लीं और नीलम की हथेलियों के उस हल्के, नियंत्रित दबाव को अपने गालों पर महसूस करने लगी। उस समय कमरे के भीतर जल रहे उस पीतल के दीये की लौ भी मानो शांत होकर उन्हीं की साँसों की लय और गर्मी में थिरकने लगी थी। छोटी ने अपने कांपते और भीगे हुए हाथों को धीरे से उठाया और नीलम की कलाई को बहुत हल्के से, जैसे किसी अमोल वस्तु को थामा जाता है, पकड़ लिया--यह उसकी ओर से दी गई वह पहली मौन और स्पष्ट स्वीकृति थी जो दुनिया के किसी भी लिखित शब्द से अधिक शक्तिशाली, पवित्र और जीवंत थी। नीलम ने छोटी के उस छोटे से, किंतु गहरे संकेत को तुरंत समझते हुए अपनी बाहों का घेरा थोड़ा और फैलाया और छोटी को अपनी ओर खींचकर अपने वक्ष और कंधे से मजबूती से लगा लिया।

छोटी का मस्तक जब नीलम के चौड़े और पुष्ट कंधे पर टिका, तो उसके भीतर का वह छिपा हुआ कंपन और अज्ञात भय धीरे-धीरे शांत होकर एक स्थिर शांति में बदलने लगा। नीलम की उंगलियाँ अब छोटी के लंबे, घने और रेशमी बालों के केस-पाश में बहुत ही सुकुमारता से फिर रही थीं, और उनके हर फेर के साथ छोटी के भीतर का वह बचा-कुचा संकोच हवा में उड़ता जा रहा था।

उस हवेली के उस मखमली शयनकक्ष में अब केवल दो साँसों का वह संगीत शेष था जो धीरे-धीरे एक ही महा-संगीत में ढलने लगा था। छोटी ने अपनी बंद आँखों के भीतर महसूस किया कि नीलम के इस स्पर्श में न तो कोई जल्दबाजी थी और न ही किसी प्रकार के उपभोग का स्वार्थ; बल्कि उसमें एक ऐसा परम समर्पण, सुरक्षा और वात्सल्य का भाव था जो किसी भटके हुए राही को अपनी मंजिल पर पहुँचने पर मिलता है।

उस पहली रात के उस शुरुआती पहर में जब दोनों के शरीर आपस में थोड़े और निकट आए, तो छोटी को यह स्पष्ट आभास हो गया कि यह मिलन केवल दो व्यक्तियों का भौतिक संपर्क नहीं है, बल्कि दो युगों, दो चेतनाओं और दो प्राणों का वह पावन संगम है जहाँ अज्ञान हमेशा के लिए मिट जाता है और प्रेम का सूर्य अपनी पूरी गरिमा, उष्णता और प्रकाश के साथ उदय होने के लिए पूरी तरह तैयार हो चुका होता है।

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जब संकोच की वह पहली और भारी परत पूरी तरह पिघल चुकी थी और छोटी के मन का हर अनजाना भय नीलम के अगाध स्नेह में घुल चुका था, तब उस रात का आंचल और अधिक गहरा, सघन और अंतरंग हो गया। नीलम ने बहुत ही सधे हुए, कलात्मक और आत्मीय भाव से छोटी के सुंदर मुख-मण्डल को अपने दोनों हाथों के प्याले में समेटा। उनके चेहरे के बीच की वह भौतिक दूरी अब इतनी कम रह गई थी कि दोनों की गर्म साँसें आपस में पूरी तरह उलझने लगी थीं। नीलम ने बिना किसी हड़बड़ाहट के अपने अधरों को बहुत ही कोमलता और नियंत्रण से छोटी के कांपते हुए अधरों के पास लाया।

जब नीलम के ओठों ने छोटी के सुकुमार अधरों को छुआ, तो छोटी का पूरा शरीर एक जोरदार सिहरन से काँप उठा। नीलम ने बहुत ही नियंत्रित और सधे हुए ढंग से उस मिलन को आगे बढ़ाया--पहले केवल एक हल्का सा स्पर्श, फिर उस पोर पर कुछ पलों का ठहराव, और फिर उस रस का पान जिसे कामशास्त्र के आचार्यों ने प्रेम की सबसे बड़ी कला कहा है।

अधरों के उस पावन और गहरे मिलन के बाद, नीलम ने अपनी बाहों के आलिंगन के घेरे को और अधिक सघन बना दिया। उन्होंने छोटी के सुकुमार शरीर को अपनी विशाल और दृढ़ छाती से इस प्रकार कसकर सटा लिया कि दोनों के शरीरों के बीच की सारी दूरियाँ पूरी तरह शून्य हो गईं।

कामशास्त्र के प्राचीन ग्रंथों में वक्ष-स्थल के इस संपूर्ण आलिंगन को दो शरीरों का सबसे ईमानदार और प्राणवान मिलन कहा गया है।

नीलम की दृढ़ छाती और छोटी के सुकुमार उरोज जब आपस में मिले,

नीलम का पुष्ट वक्ष जब छोटी के कोमल, उन्नत स्तन-कलशों से सटा, तो दोनों के बीच की सारी दूरियाँ शून्य हो गईं। छोटी के स्तनाग्र (निप्पल्स) उस हल्के और स्वाभाविक घर्षण से संवेदनशील हो उठे, जिससे उसके पूरे शरीर में एक अद्भुत सिहरन दौड़ गई।

तो यह केवल दो भौतिक शरीरों का संपर्क नहीं था, बल्कि यह दो चेतनाओं का एक-दूसरे में पूरी तरह घुल जाने का क्षण था। छोटी का मस्तक नीलम के कंधे पर टिका था, और दोनों के हृदय की तीव्र धड़कनें एक ही ताल पर थिरकने लगी थीं।

रात के उस पहले प्रहर की सघन ऊष्मा अब धीरे-धीरे एक प्रगाढ़, शांत और स्थिर विश्राम में बदल रही थी। हवेली के बाहर लखनऊ की पुरानी गलियों में समय की गति ठहर सी गई थी। छोटी--जो संध्या के समय अपने ही भीतर उठने वाले अज्ञात भय से काँप रही थी--अब नीलम की विशाल और सुरक्षित बाहों में इस तरह सिमटी हुई थी मानो उसे संसार की सारी सुरक्षा उसी एक आंचल में मिल गई हो। छोटी ने एक लंबी और गहरी साँस ली, जो इस बात का प्रतीक थी कि उसके भीतर का अंतिम संकोच भी अब प्रेम की उस पावन अग्नि में निर्मल हो चुका था। उसने अपना सिर वापस नीलम की छाती पर टिका दिया, जहाँ नीलम के हृदय की नियमित धड़कन उसे किसी लोरी की तरह आश्वस्त कर रही थी।

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हवेली के मखमली शयनकक्ष में रात्रि के प्रथम प्रहर का वह प्रारंभिक विश्राम अब धीरे-धीरे अपने पूर्णत्व को प्राप्त कर चुका था। बाहर, गगन के पट पर तारे अपनी धीमी चमक से आसमान को सींच रहे थे, और मेहराबदार झरोखों से आती ठंडी बयार परदों को हल्के से हिला रही थी। अंदर, पीतल के झड़बेरदानों में जलते दीये की लौ अब मंद हो चुकी थी, किंतु दोनों बहनों--नीलम और छोटी--के प्राणों के बीच जल रही वह आंतरिक ज्योति अब और अधिक प्रखर, स्थिर और जीवंत हो चुकी थी। छोटी, जो कुछ घंटे पूर्व अपने ही भीतर उठने वाले अनछुए आवेगों से काँप रही थी, अब नीलम की बाहों के घेरे में एक नई और अलौकिक निश्चिंतता का अनुभव कर रही थी।

उसका संकोच अब पूरी तरह पिघल चुका था, और उसकी जगह ले चुकी थी उस ज्ञान की गहन पिपासा जो केवल प्रेम और समर्पण के मार्ग पर चलकर ही शांत हो सकती है।

नीलम ने अपनी पलकें उठाईं और छोटी के शांत मुखमंडल को निहारते हुए उसके ललाट (माथे) पर एक स्नेहिल चुंबन अंकित किया। "जाग रही हो, मेरी छोटी?" नीलम की वह भारी और मखमली आवाज़ उस सन्नाटे में किसी रेशमी धागे की तरह गूँजी।

छोटी ने अपनी आँखें धीरे से खोलीं। उसकी आँखों में अब कोई असमंजस नहीं था; उनमें एक निर्मल प्रज्ञा और अगाध विश्वास की चमक थी। "नींद तो जैसे कहीं खो गई है, दीदी," छोटी ने अत्यंत कोमल स्वर में उत्तर दिया। "ऐसा लगता है जैसे मेरे भीतर का एक नया संसार अभी-अभी जन्मा है, और मैं उसकी हर गली को पहचानना चाहती हूँ।"

आधुनिक न्यूरोलॉजी और शरीर रचना विज्ञान के दृष्टिकोण से, रात्रि के इस द्वितीय प्रहर में दोनों के शरीर और तंत्रिका तंत्र में एक विशिष्ट जैविक संक्रमण घटित होता है। जब बाहर की ठंडी हवा खिड़की से भीतर आती है और दोनों के उष्मित शरीरों से टकराती है, तो त्वचा के नीचे स्थित थर्मोरेसेप्टर्स (Thermoreceptors) अत्यधिक संवेदनशील हो जाते हैं। यह तापमान का सूक्ष्म अंतर स्पर्श के प्रति शरीर की ग्राहकता को कई गुना बढ़ा देता है। प्रथम प्रहर की गहन शांति और 'ऑक्सीटोसिन' के स्राव के बाद, अब मस्तिष्क में डोपामाइन और सेरोटोनिन का एक नया संतुलन स्थापित होता है, जो छोटी को मानसिक रूप से और अधिक ऊर्जावान और अंतरंगता के लिए उत्सुक बनाता है। त्वचा के हर हल्के संपर्क पर रीढ़ की हड्डी के माध्यम से मस्तिष्क तक पहुँचने वाले विद्युत संकेत अब और अधिक तीव्र और स्पष्ट हो जाते हैं।

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रात्रि के द्वितीय प्रहर की वह ठंडी और शांत बयार जब उस ऐतिहासिक हवेली के मखमली शयनकक्ष के झरोखों से होकर गुजरी, तो भीतर जल रहे पीतल के दीये की लौ हल्की सी काँपी, जिससे दीवारों पर दोनों बहनों की आलिंगनबद्ध परछाइयाँ किसी धीमी लय में थिरकने लगीं। नीलम ने प्रगल्भा नायिका के रूप में उस प्रेम-साधना के हर द्वार को सहजता से खोला था, और छोटी मुग्धावस्था के संकोच को पीछे छोड़कर नीलम की हर साँस और हर स्पर्श के साथ अपनी देह और चेतना को पूर्ण रूप से समर्पित करने के लिए तत्पर थी।

नीलम ने बहुत ही सुकुमारता और नियंत्रण के साथ छोटी की कटि (कमर) और पेडू के हिस्से को अपने दोनों हाथों की हथेलियों में थामा। उन्होंने छोटी को अपनी ओर थोड़ा और खींचा, जिससे दोनों के श्रोणि-प्रदेश (Pelvic Region) और उदर (पेट) का संपर्क और अधिक गहरा और सघन हो गया।

कामशास्त्र के प्राचीन आचार्यों--विशेषकर वात्स्यायन के कामसूत्र और रतिरहस्य--में प्रेम के इस द्वितीय चरण को 'श्रोणि-संसूचन' और अंगों के परस्पर मिलन का अत्यंत वैज्ञानिक एवं कलात्मक विधान माना गया है।

जब दो शरीर अपनी कटि और श्रोणि क्षेत्र को एक-दूसरे के निकट लाते हैं, तो वहाँ की मांसपेशियाँ और संवेदी ऊतक एक ऐसी लय पैदा करते हैं जो किसी भी बाहरी कोलाहल को पूरी तरह मिटा देती है। नीलम के इस स्पर्श ने छोटी के भीतर छुपी उस कामशास्त्रीय ऊर्जा को जाग्रत कर दिया जो अभी तक प्रसुप्त अवस्था में थी। छोटी ने अपनी आँखें मूँद लीं। उसकी पलकें हल्की सी काँप रही थीं, और उसके मुख से एक भीगी हुई फुसफुसाहट निकली--*"दीदी..."*

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