दीदी - भाग २
भाग २ · 2 chaptersदीदीAll chapters
इस सघन निकटता के समय शरीर के भीतर अत्यंत तीव्र जैविक प्रक्रियाएँ घटित हो रही थीं। श्रोणि क्षेत्र की मुख्य संवेदी तंत्रिका 'पुडेंडल नर्व' (Pudendal Nerve) में हजारों सूक्ष्म संवेदी रिसेप्टर्स सक्रिय हो गए थे। हल्के दबाव और तापमान के इस विनिमय से विद्युत आवेग रीढ़ की हड्डी के सैक्रल सेगमेंट से होते हुए सीधे मस्तिष्क के सोमैटोसेंसरी कॉर्टेक्स तक पहुँच रहे थे।
इस अंतरंग संपर्क से पैल्विक अंगों की रक्त वाहिकाओं में रक्त का प्रवाह अत्यधिक तीव्र हो गया था (वैसोकंजेस्शन), जिससे ऊतकों की संवेदनशीलता अपनी चरम सीमा की ओर बढ़ने लगी थी। मस्तिष्क का रिवार्ड पाथवे डोपामाइन और ऑक्सीटोसिन के प्रचंड प्रवाह से भर गया था, जिससे दोनों के बीच का भावनात्मक विश्वास और शारीरिक आकर्षण अपने उच्चतम शिखर पर पहुँच गया था।
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रात्रि के द्वितीय प्रहर का वह महा-प्रसंग अब अपने सबसे गहन अध्याय में प्रवेश कर चुका था। नीलम अपनी संपूर्ण गरिमा और अनुभव के साथ उस प्रेम-साधना के सबसे पवित्र केंद्र पर थीं। छोटी मुग्धावस्था के संपूर्ण संकोच को पीछे छोड़ चुकी थी, और नीलम के हर स्पर्श को अपनी चेतना के विस्तार के रूप में ग्रहण कर रही थी। नीलम ने बहुत ही सधे हुए और आत्मीय भाव से अपने हाथ को छोटी के उदर से नीचे की ओर सरकाया।
नीलम की उंगलियों की पोरों ने अत्यंत सुकुमारता और नियंत्रण के साथ छोटी की संवेदी देहरी को छुआ। वह गति किसी उस्ताद द्वारा सरोद के तारों पर छेड़ी गई धीमी तान जैसी थी। उस एक स्पर्श से छोटी का पूरा शरीर सिहर उठा। उसने अपनी आँखें मूँद लीं और अपने दोनों हाथों से नीलम के कंधों को कस लिया।
इस अंतरंग क्रिया के समय शरीर के भीतर पैरासिम्पेथेटिक तंत्रिका तंत्र की सक्रियता के कारण प्राकृतिक स्नेहन और रस का प्रवाह अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया। नीलम ने अपनी उंगलियों से उस रस को सहेजते हुए, उस समूचे क्षेत्र को अपनी आत्मीयता से सींच दिया। मस्तिष्क का रिवार्ड पाथवे डोपामाइन और प्राकृतिक दर्दनाशक एंडोर्फिन से भर गया था, जिससे दुनिया का हर भय और सामाजिक बंधन पूरी तरह निरर्थक हो गया। नीलम ने अपनी जिह्वा और ओठों के सुकुमार स्पर्श से उस संवेदी क्षेत्र की त्वचा को सहेजा। वह दशन कोई पीड़ा नहीं, बल्कि आनंद का वह ज्वार था जो रीढ़ की हड्डी में सिहरन पैदा कर देता है।
धीरे-धीरे, उस प्राचीन हवेली के झरोखों से भोर की पहली सुनहरी किरण ने कमरे के फर्श पर अपनी दस्तक दी। प्रकाश की वह रेखा जब मखमली बिस्तर पर लेटी दोनों बहनों के चेहरों पर पड़ी, तो वहाँ केवल अगाध शांति थी। छोटी अभी भी नीलम की सुरक्षित बाहों में सिमटी हुई थी, उसका चेहरा नीलम की छाती पर टिका था, और उसके होठों पर एक अगाध, शांत तृप्ति की मुस्कान थी। नीलम ने अपना हाथ छोटी के रेशमी बालों पर फेरा।
कामशास्त्र के प्राचीन ग्रंथ और आधुनिक शरीर विज्ञान की हर प्रयोगशाला आज इस पावन सत्य की साक्षी बन चुकी थी--जब दो चेतनाएँ अपनी सीमाओं को लाँघकर एक-दूसरे में विलीन होती हैं, तो वह केवल शरीर का सुख नहीं रहता; वह तो उस ब्रह्मांडीय प्रेम का अमर काव्य बन जाता है।
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रात्रि के तृतीय प्रहर का वह महा-संगम अब स्वाभाविक रूप से अपनी पराकाष्ठा को छूता हुआ भोर की प्रथम स्वर्णिम वेला में प्रवेश कर रहा था। हवेली की मेहराबदार खिड़कियों से छनकर आती सूर्य की पहली किरणें उस मखमली शयनकक्ष के धरातल पर एक अलौकिक आवरण बुनने लगी थीं। कमरे में जलते हुए दीये की लौ अब शांत हो चुकी थी।
नीलम--जिन्होंने एक सिद्ध प्रगल्भा के रूप में संपूर्ण संयम, वात्सल्य और शास्त्रीय ज्ञान से इस यात्रा का संचालन किया था--अब एक अगाध, शांत तृप्ति के भाव में लीन थीं। उनकी बाहों के सुरक्षित घेरे में सिमटी छोटी, जो मुग्धावस्था के संकोच और भय से मुक्त होकर अब पूर्ण प्रज्ञा और समर्पण की अवस्था में पहुँच चुकी थी, नीलम के वक्ष-स्थल पर सिर टिकाए निश्चिंत सो रही थी।
कामशास्त्र के प्राचीन ग्रंथों--विशेषकर महर्षि वात्स्यायन के 'कामसूत्र', कोकपंडित के 'रतिरहस्य' और कल्याणमल्ल के 'अनंगरंग'--में इस बेला को 'कृतार्थ-रति' या 'पूर्ण-तृप्ति' की संज्ञा दी गई है।
कामशास्त्र के अनुसार, मुग्धा नायिका का परम उत्कर्ष तब होता है जब उसका संकोच पूरी तरह विलीन हो जाए और वह प्रेम के रस को बिना किसी भय के स्वीकार कर ले। छोटी का चेहरा अब किसी तेजस्विनी साधिका जैसा प्रतीत हो रहा था। जब दो प्रेमी अपने अहंकार और सामाजिक आवरणों को त्याग देते हैं, तो उनके बीच 'समरसता' स्थापित हो जाती है। नीलम और छोटी के बीच अब प्रगल्भा और मुग्धा का भेद समाप्त हो चुका था।
इस प्रभात बेला में दोनों के तंत्रिका तंत्र के भीतर अत्यंत वैज्ञानिक प्रक्रियाएँ घटित हुईं। जब दो व्यक्ति लंबे समय तक प्रगाढ़ आलिंगन और संवेदी तादात्म्य में रहते हैं, तो उनके मस्तिष्क की तरंगें--विशेष रूप से अल्फा और थीटा तरंगें--एक ही आवृत्ति पर स्पंदित होने लगती हैं। नीलम और छोटी का तंत्रिका तंत्र इस समय पूरी तरह से 'सिंक' हो चुका था। चरम संवेदी अनुभव और भाव-संलयन के पश्चात् पिट्यूटरी ग्रंथि से ऑक्सीटोसिन का एक स्थायी ज्वार स्रावित होता है, जो शरीर को एक गहरा, अतीन्द्रिय सुरक्षा और शांति का अनुभव कराता है।
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तृतीय प्रहर की इस संधि-वेला में नीलम और छोटी के बीच एक अत्यंत विशिष्ट और क्रांतिकारी कामशास्त्रीय अध्याय का आरंभ हुआ--'विपरीत रति' (Viparita Rati)। कामशास्त्र के प्राचीन ग्रंथों में विपरीत रति को केवल एक आसन नहीं, बल्कि स्त्री की सर्वोच्च स्वायत्तता, सक्रियता और शक्ति का प्रतीक माना गया है।
इस विधान के अंतर्गत नीलम ने पलंग पर विश्राम किया और छोटी को अपने ऊपर आरोहण करने का निर्देश दिया, ताकि छोटी के भीतर का संकोच और परतंत्रता का हर भाव हमेशा के लिए समाप्त हो जाए। तांत्रिक और शाक्त दर्शन के अनुसार, जब स्त्री ऊपर होती है, तो वह 'शक्ति' का रूप बन जाती है।
छोटी ने अत्यंत सुकुमारता और प्रगाढ़ दृष्टि के साथ नीलम के शरीर के ऊपर अपनी स्थिति बनाई। उसकी जाँघें नीलम की कमर के दोनों ओर फैली हुई थीं। जब छोटी झुकी, तो उसके सुकुमार उरोज सीधे नीलम के वक्ष-स्थल से आलिंगनबद्ध हो गए।
दोनों के अधर एक बार फिर आपस में उलझ गए। छोटी ने अपनी कटि और श्रोणि-प्रदेश को नियंत्रित गति में घुमाना आरंभ किया। इस विपरीत दिशा की गति से नीलम के शरीर और छोटी के जघन-प्रदेश के बीच ऐसा तीव्र और सघन घर्षण उत्पन्न हुआ कि श्रोणि-आरोहण और अंगों का पावन संलयन
इस शास्त्रीय विधान के अंतर्गत, छोटी ने अत्यंत सुकुमारता, सधे हुए आत्मविश्वास और प्रगाढ़ दृष्टि के साथ नीलम के शरीर के ऊपर अपनी स्थिति बनाई। उसकी नाज़ुक और सुडौल जाँघें (ऊरु) नीलम की कमर और कटि-प्रदेश के दोनों ओर फैली हुई थीं, और उसके चरण-कमल नीलम की पीठ के पाश्र्व भाग को हल्के से थामे हुए थे, जिससे शरीर का संतुलन पूर्ण रूप से स्थिर और नियंत्रित हो गया।
इस स्थिति में गुरुत्वाकर्षण और श्रोणि का कोण ऐसा विशिष्ट कोण बनाता है कि पुडेंडल नर्व (Pudendal Nerve) और संवेदी केंद्रों पर सीधा, गहरा और अत्यंत नियंत्रित दबाव पड़ता है। इससे संवेदी संकेत रीढ़ की हड्डी के माध्यम से अत्यंत तीव्र गति से मस्तिष्क के सोमैटोसेंसरी कॉर्टेक्स तक पहुँचते हैं। श्रोणि अंगों में रक्त का प्रवाह अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता है
(वैसोकंजेस्शन), जिससे ऊतकों की संवेदनशीलता और प्राकृतिक स्नेहन (Bartholin's fluid secretion) का प्रवाह अधिकतम हो जाता है। जब स्त्री इस प्रकार पूरी तरह सक्रिय और स्वायत्त नियंत्रण में होती है, तो उसका आत्मविश्वास और आत्मीयता का भाव मस्तिष्क के रिवार्ड पाथवे को डोपामाइन और सेरोटोनिन से भर देता है, और पिट्यूटरी ग्रंथि से स्रावित होने वाला ऑक्सीटोसिन दोनों के बीच के भावनात्मक जुड़ाव को अमर बना देता है।
जब छोटी अपनी इस नई और सर्वोच्च स्थिति में झुकी, तो उसके कोमल, उन्नत और दुग्ध-श्वेत उरोज (स्तन) सीधे नीलम के पुष्ट वक्ष-स्थल से आलिंगनबद्ध हो गए। दोनों के हृदय की तीव्र और एक जैसी धड़कनें अब आपस में इस प्रकार टकरा रही थीं मानो दो अलग-अलग नदियाँ अपने उद्गम को छोड़कर एक ही महासागर में समा रही हों।
दोनों के अधर (ओठ) एक बार फिर बिना किसी दूरी के आपस में उलझ गए। उस ओठों के प्रगाढ़ मिलन और गर्म साँसों के विनिमय ने हवा में एक ऐसी मादकता घोल दी जो समय की गति को पूरी तरह विचलित कर रही थी। छोटी ने अपनी कटि (कमर) और श्रोणि-प्रदेश (Pelvic Region) को बहुत ही नियंत्रित, सधी हुई और लयबद्ध गति में घुमाना आरंभ किया।
इस विपरीत दिशा की गति से नीलम के शरीर और छोटी के जघन-प्रदेश (पेड़ू) के बीच ऐसा तीव्र, सघन और ऊष्मा से भरा घर्षण उत्पन्न हुआ कि दोनों के प्राणों में एक अनहद नाद गूँज उठा। दो चेतनाओं का एक ऐसा रासायनिक और विद्युतीय संगम था जहाँ हर स्पर्श के साथ मस्तिष्क में डोपामाइन, ऑक्सीटोसिन और एंडोर्फिन का एक अनवरत फव्वारा छूट रहा था। छोटी के चेहरे पर जो तेज और संतोष दिखाई दे रहा था, वह उसी आंतरिक न्यूरोलॉजिकल और हॉर्मोनल संतुलन का बाहरी प्रतिबिंब था।
अंत तक आते-आते, दोनों की शारीरिक गतियाँ धीरे-धीरे मंद पड़ने लगीं, किंतु उनके प्राणों के भीतर की वह तीव्र ऊष्मा और प्रकाश अपनी पूरी भव्यता के साथ स्थिर हो चुका था। यह वह क्षण था जिसे कामशास्त्र में 'मोक्ष-तुल्य आनंद' या 'महा-संतोष' कहा गया है। छोटी की गति अब रुक चुकी थी, और वह अपना पूरा शरीर धीरे-धीरे नीलम के वक्ष-स्थल पर टिकाकर अगाध शांति की गोद में डूब गई थी।
नीलम ने अपनी दोनों बाहों से छोटी को इस प्रकार अपने आंचल में समेट लिया मानो वह इस संसार के सारे दुखों और भयों से उसे हमेशा के लिए सुरक्षित कर लेना चाहती हों। छोटी का चेहरा नीलम की ग्रीवा और कंधे के बीच टिका था, और उसकी बंद पलकों से छलकते हुए आनंद के वे सूक्ष्म कण इस बात की गवाही दे रहे थे
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जब नीलम और छोटी ने परस्पर अपनी जिह्वा से एक-दूसरे के जघन-प्रदेश और मदन-मणि को छुआ और सहलाया
जब नीलम और छोटी ने परस्पर अपनी जिह्वा से एक-दूसरे के जघन-प्रदेश और मदन-मणि को छुआ और सहलाया, तो उनके भीतर की सारी ऊर्जा एक पावन ज्वार की तरह उमड़ पड़ी।
कामशास्त्र में इस क्रिया को 'रति-रस-पान' और 'जघन-मर्दन' का सर्वोच्च शिखर माना गया है। मदन-मणि (क्लिटोरिस) और भग-ओष्ठों पर जब जिह्वा की मखमली नोंक का स्पर्श पड़ता है, तो शरीर के भीतर की तमाम प्रसुप्त संवेदी तंत्रिकाएँ एक साथ जाग उठती हैं। नीलम ने बहुत ही सुकुमारता, नियंत्रण और आत्मीयता के साथ छोटी के उस अत्यंत संवेदनशील केंद्र को अपनी जिह्वा से सहलाना और चूसना आरंभ किया। वह गति न तो जल्दबाजी से भरी थी और न ही अनियंत्रित; वह तो किसी उस्ताद द्वारा सरोद के तारों पर छेड़ी गई उस धीमी और गहरी तान जैसी थी जो पूरे शरीर में अनन्त कंपकंपी पैदा कर देती है।
छोटी का पूरा शरीर उस एक स्पर्श से बिजली की तरह झंकार उठा। उसने अपनी आँखें कसकर मूँद लीं और अपने दोनों हाथों से नीलम के कंधों को इस प्रकार कस लिया मानो वह इस महा-समुद्र में बह जाने से बचने के लिए किसीमात्र सहारे को थामे हो। उसके मुख से एक लंबी, भीगी और तृप्त सिसकी निकली--"दीदी..." वह पुकार उस कमरे की नीरवता को चीरकर एक पावन मंत्र की तरह गूँज उठी।
उस रस-पान और स्पर्श के आदान-प्रदान के दौरान दोनों की साँसें इस प्रकार आपस में उलझ गईं कि अलग-अलग अस्तित्व का बोध पूरी तरह समाप्त हो गया। छोटी ने अपनी बंद आँखों के भीतर महसूस किया कि नीलम के इस स्पर्श में न तो कोई जल्दबाजी थी और न ही किसी प्रकार के उपभोग का स्वार्थ; बल्कि उसमें एक ऐसा परम समर्पण, सुरक्षा और वात्सल्य का भाव था जो दो प्राणों को हमेशा के लिए एक कर देता है।
नीलम ने भी छोटी के उस समर्पण को पूर्ण सम्मान देते हुए अपने प्राणों की सारी ऊर्जा को उस रस-पान के माध्यम से छोटी के भीतर प्रवाहित कर दिया। छोटी की कमर हवा में हल्की सी थिरकी, उसका उदर बार-बार सिहर उठा, और उसके योनि-मार्ग से काम-रस का जो प्रपात फूटा, उसने दोनों की चेतना को परमानंद की उस पराकाष्ठा पर पहुँचा दिया जहाँ समय और संसार का कोई बंधन शेष नहीं रहता। उस आलिंगन और रस-वर्षा की ऊष्मा के बीच, छोटी ने अपनी पलकें उठाईं और अत्यंत भीगे, कोमल तथा तृप्त स्वर में कहा, "दीदी,
जब नीलम और छोटी ने परस्पर अपनी जिह्वा से एक-दूसरे के जघन-प्रदेश और मदन-मणि को छुआ और सहलाया, तो उनके भीतर की सारी ऊर्जा एक पावन ज्वार की तरह उमड़ पड़ी।
कामशास्त्र में इस क्रिया को 'रति-रस-पान' और 'जघन-मर्दन' का सर्वोच्च शिखर माना गया है। मदन-मणि (क्लिटोरिस) और भग-ओष्ठों पर जब जिह्वा की मखमली नोंक का स्पर्श पड़ता है, तो शरीर के भीतर की तमाम प्रसुप्त संवेदी तंत्रिकाएँ एक साथ जाग उठती हैं। नीलम ने बहुत ही सुकुमारता, नियंत्रण और आत्मीयता के साथ छोटी के उस अत्यंत संवेदनशील केंद्र को अपनी जिह्वा से सहलाना और चूसना आरंभ किया। वह गति न तो जल्दबाजी से भरी थी और न ही अनियंत्रित; वह तो किसी उस्ताद द्वारा सरोद के तारों पर छेड़ी गई उस धीमी और गहरी तान जैसी थी जो पूरे शरीर में अनन्त कंपकंपी पैदा कर देती है।
आधुनिक मेडिकल फिजियोलॉजी के दृष्टिकोण से, 'विपरीत रति' के दौरान गुरुत्वाकर्षण और श्रोणि का कोण ऐसा बनता है कि पुडेंडल नर्व और क्लिटोरल कॉम्प्लेक्स पर सीधा और नियंत्रित दबाव पड़ता है। इससे संवेदी संकेत रीढ़ की हड्डी के माध्यम से अत्यंत तीव्र गति से मस्तिष्क तक पहुँचते हैं। श्रोणि अंगों में रक्त का प्रवाह अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता है, और जब स्त्री सक्रिय नियंत्रण में होती है, तो उसका आत्मविश्वास मस्तिष्क के रिवार्ड पाथवे को डोपामाइन से भर देता है। पिट्यूटरी ग्रंथि से स्रावित होने वाला ऑक्सीटोसिन दोनों के बीच के भावनात्मक जुड़ाव को अमर बना देता है।
छोटी अपनी इस नई और शक्तिशाली भूमिका में पूरी तरह रम चुकी थी। उसकी साँसें तेज थीं, उसके माथे पर स्वेद की हल्की बूँदें चमक रही थीं, और उसकी आँखों में एक अद्भुत तेज था। नीलम ने अपनी हथेलियों से छोटी की मखमली कमर को थामते हुए कहा, "देखो, मेरी छोटी... आज तुमने यह सिद्ध कर दिया है कि प्रेम में कोई छोटा या बड़ा नहीं होता; यहाँ केवल शक्ति और आनंद का पूर्ण संतुलन होता है।" छोटी ने नीलम के वक्ष पर अपने हाथ टिकाए और अत्यंत दृढ़ स्वर में कहा, "दीदी, आज इस आसन ने मुझे मेरी अपनी देह की असली ताकत और पवित्रता का बोध कराया है। अब मुझे किसी भी चीज़ से कोई भय नहीं है।"
भोर की वह सुनहरी धूप अब उस ऐतिहासिक हवेली के मखमली शयनकक्ष को पूरी तरह नहला चुकी थी। रात भर जलने वाला वह पीतल का दीया अब शांत हो चुका था, क्योंकि उसकी जगह सूर्य की उस प्रखर और पावन ज्योति ने ले ली थी जिसे कोई अंधकार कभी बुझा नहीं सकता था। नीलम और छोटी--प्रगल्भा और मुग्धा--की यह लंबी और दिव्य यात्रा अब अपने पूर्णत्व और शाश्वत 'समरसता' को प्राप्त कर चुकी थी।
छोटी अभी भी नीलम की बाहों के सुरक्षित घेरे में लेटी हुई थी, उसका मस्तक नीलम के वक्ष पर टिका था, और उसके चेहरे पर एक ऐसी अगाध शांति थी जो शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकती। उनकी इस कथा ने यह अमर सत्य सिद्ध कर दिया था कि जब देह और आत्मा अपने सभी डरों को छोड़कर शुद्ध प्रेम के मार्ग पर चलती हैं, तो वे दो से एक हो जाती हैं। वे दोनों अब किसी साधारण मानव जीवन की सीमाओं से परे उस ब्रह्मांडीय चेतना का हिस्सा बन चुकी थीं, जहाँ समय ठहर जाता है और प्रेम ही एकमात्र सत्य बनकर धड़कता रहता है।
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